यादें

यादों का अपना  ही विचित्र  तर्क  है 

कुछ  रहे सतह  में, तैयार सदैव महकते,,

कुछ धुंधले , खोये से, छिपे जाते  किस कोने में 

पलों से न जाने कैसा समीकरण है यादों  का 

कि  कुछ को तो  पिरोह के उत्कृष्ट  माला बना दे,

और कुछ को छितरा दे जगह’जगह 

कहीं बिछा दे सेज वह मोहक सी 

तो  कांटे भी डाल दे यहाँ वहां 

दे जब दस्तक  द्वार पर 

तो उमड़ आते है सहज  ही से  कुछ

और कुछ लोप हो जाते है जाने किस अंधकार में’

बढ़ते  कदम के साथ  समय के

 कभी कभी,

मैं  हो आता हूँ यादों की  चौकठ पर     


Leave a comment