“आज फिर वही हुआ जिसका डर था, आज फिर कुछ नहीं हुआ.” किसी के द्वारा कहे गए इस कथन से मैं केवल सहमत ही न था, बल्कि मैंने इस तथ्य को अनुभव भी किया जब मै विजयवाड़ा, आज से कुछ ३६ साल पूर्व, पहली बार आया। मेरी पत्रकारिता की यात्रा यहीं से शुरू हुई थी. घर से दूर, अकेला, नया शहर, नई भाषा, और एक नया ही वातावरण. उन दिनों यहाँ ऐसा प्रतीत होता था मानो समय ने अपने लिए यहाँ एक सेवा-निवृत्ति घर ले लिया हो. फलस्वरूप मैं अपना अधिकतम समय इंडियन एक्सप्रेस के कार्यालय में ही व्यतीत करता था. समाचार की इस दुनिया में, टेलिप्रिंटर और टाइपराइटर के निरन्ततर शोर में, और कुछ न कुछ होती दुनिया की अलग ही गति में खो जाना सहज था.
यही गति शायद मुझे कई बार विजयवाड़ा रेलवे स्टेशन ले आती थी. एक महत्वपूर्ण जंक्शन होने के नाते, रेलों और लोगों का यहां आना जाना लगा रहता था. यहां मानो समय खुद ही को पकड़ नहीं पा रहा हो. पर मेरा सरोकार वहां के गरमा गरम भोजन से था. चाहे भोर हो या देर रात, वहां कुछ न कुछ तो मिल ही जाता था.
धीरे -धीरे दोस्त बने और शहर की गति से भी ताल मेल बैठता रहा. क्या गली, क्या कूचे, चाय की टपरी, मेस का खाना और शहर की कई नयी जगहों से परिचित हुआ. कृष्णा नदी पर स्थित पुल एक ऐसी जगह थी जहां दोस्तों के संग कई कहानियां बांटी और अपने आप को देखने का भी मौका मिला . देखते देखते छह साल बीत गए और मै एक नए सफर पर निकल पड़ा.
आज तीस साल बाद फिर विजयवाड़ा आना हुआ. बदलाव के सुनामी से भला कौन बच पाया! किसी भी अन्य शहर की भांति वही वाहनों का शोर गुल, वही भाग दौड़. वे गलियां अब सड़क बन चुकी हैं, कुछ कूचे तो लुप्त हो गए. वह चाय की टपरी, वह मेस,अब सब बस अतीत के पन्नों में सिमट कर रह गया. अड्डे अब शायद कहीं और जमते होंगे. मकानों ने अपना विनम्र चोला त्याग कर रोबदार पोशाक पहन ली है. यहाँ तक कि समय ने भी अपना सेवा-निवृत्ति घर बेच कर दो-मंज़िला मकान ले लिया है.
कृष्णा नदी के पुल पर अब भी वही शान्ति है, पर वहां से गुज़रते लोगों को कुछ पल रुकने की फुर्सत नहीं। बदलाव से वहां का मशहूर कनकदुर्गा मंदिर भी अछूता नहीं रह पाया है. अब उस मंदिर के प्रांगण का विस्तार हो चुका है और भक्तों को कई सुविधाएँ उपलब्ध हैं. मदिर के स्वर्णसुषोभित दुर्ग की झलक ही देखने को मिलती है जब कि पहले पूरा दुर्ग दूर से नज़र आता था.
इस ऊपरी सतह को कुरेद कर देखो तो अब भी वही सौंधी सी सुगंध है. बदलाव के साथ – साथ चलते हैं तो हमें कुछ पीछे छूट जाने का एहसास नहीं होता. पर यूँ सालों बाद आकर देखने पर वह स्पष्ट दिखता है.
आज फिर कुछ नहीं हुआ के उस कथन को अब नया अर्थ मिला है. होता तो बहुत कुछ है पर उसकी अनुभूति देर से होती है. आज फिर वही हुआ जिसकी अपेक्षा थी, आज फिर विजयवाड़ा से मेरा दोबारा परिचय हुआ.
Leave a comment