आज एक बहुत पुरानी किताब से मिला मेरा एक पत्र । ऐसे पत्रों का किताबों से करीबी नाता होता है। ना जाने कितनी किताबों का आदान -प्रदान हो जाता है सिर्फ एक पत्र को पार लगाने में।
यह किताब एक पुराने संदूक में विराजमान थी। इतने दिन वह वहीं रही , यह भी एक अचरज की ही बात है।
किताब की हालत ऐसी, मानो पुरातत्व विभाग उसे पा कर खुशी से फूला न समाए।
ऐसे लिपटा था वह पत्र किताब के पन्नों से मानो लय हो चला था किताब में ही। और हो भी क्यों नहीं भला?
कई वर्षो से वह इसी किताब में दम तोड़ रहा था । उस पत्र की जो मंज़िल थी वह वहां तक कभी न पहुंच सका।
उस पत्र के तीनों पन्ने अब एक साथ जुड़े थे मानो एक दूसरे को सांत्वना दे रहे हों और कह रहे हो कि आज नहीं तो कल उन्हें अपना मुकाम मिलेगा।
सारे पन्नों के रंग उड़ चुके थे, पन्ने भी पीले हो चले थे, मानो उन्हें शर्म आ रही हो कि उन्होंने अपने सफर को यूं ही स्थगित कर रखा है। जहां – जहां मोड़ था वहां -वहाँ पन्ने एक दूसरे से अलग होने लगे थे।
स्याही हर जगह से धुंधली पड़ चुकी थी, शब्द एक -दूसरे का सहारा बन कर अब एक -दूसरे में लीन हो गए थे,मानो पन्ना, स्याही और शब्द में कोई अंतर ही न हो।
फिर भी – मन ,चंचल , अशांत , परवाह, मिले, उपद्रव जैसे शब्दों में आज भी जान थी, अलग खड़े थे वे. यहां-वहां । शायद उनमें अब भी एक विश्वास था अपने निर्धारित स्थल पर पहुंचने का।
इन शब्दों को देख पत्र का सार याद आ गया है, पर कई सालों तक तो प्रति शब्द याद था।
क्या कुछ और मोड़ ले लेता जीवन, यदि पह पत्र यूं ही किताब में दबा न रहता? क्या मैं आज कहीं और रहता, क्या मेरे साथियों और दोस्तों की मंडली अलग होती? या हर मोड़ घूम -घूम कर यहीं आ जाता जहां मैं आज हूं?
इन सवालों से अब भला क्या ही होगा ? बीते समय को कौन मोड़ पाया है। पर इस प्रेम पत्र का इस किताब में यूं छुपे रहने का कारण निस्संदेह याद है।
और वह था डर, डर, और बस डर !
और डर क्यों न हो ?
वह पत्र था मेरे अध्यापक का, मेरे पिताजी को । जिसमें उन्होंने मेरी कई शिकायतों को एक काव्य रचना के रूप में पिरोया था। और था उनसे मिलने का आग्रह भी ।
ऐसे पत्र भला कहां अपने निर्धारित स्थान तक पहुँचते हैं? और खास तौर पर जब उन्हें उसी आरोपी के हाथों भेजा जाए!
मेरे अनेक झूठ और बहानों के बाद अध्यापक की आस जो उन की मेरे पिता से मिलने की थी, खत्म हो गई।
और मेरा अनोखा पत्र किताब में ही दम तोड़ता रह गया।
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