नीलामी चल रही थी
नहीं, किसी की सच्चाई या सत्यवादिता की नहीं
न ही किसी के ईमान की, ना ही किसी की निष्ठा की
और पत्रकारों की तो बिलकुल नहीं ।
कहीं आम वस्तुओं की भला नीलामी होती है क्या?
नीलामी हो रही थी एक अमूल्य पायदान की
कुछ ढाई सौ साल पुराने पायदान की,
अंग्रेजों के समय के पायदान की,
पैर जिस पर रखकर अंग्रेज तस्वीर खिंचाया करते थे
बस यह जताने के लिए कि वे ही संसार चलाते हैं ।
ना जाने कितने पांवों तले वह पायदान रौंदा गया था
सिर्फ एक छवि बनाने के लिए ।
आज वह पायदान यह सब सहने का मूल्य हासिल कर रहा था ।
कुछ ही देर में नीलामी पायदान की नहीं
पर अहम की हो चुकी थी,
और नीलामकर्ता ने अपनी गति बढ़ा दी ।
जब घमंड की बोली लग रही हो तो
सोचने का अवसर क्यों ही देता ?
बस एक अभिमानी की विजय सुनिश्चित थी,
और हुई भी ।
नीलामकर्त भी खुश,
अपने कारीगरों को कुछ हिस्सा देकर कहा
“अगले महीने एक कुर्सी तैयार करना
और हां, कुछ खरोंच और लगा देना
ताकि ऐतिहासिक लगने का भ्रम पैदा कर पाए
मूल्य तो बढ़ेगा, बेचने में भी आसानी होगी”।
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