नियति

जो होता है, जब होता है, सो होता है
पर जब वह हो रहा होता है,
तब कहां ही पता चलता कि क्या होता है?
और, क्या वही होता है
जिसे होना होता है?
और, होते होते जो नहीं होता
क्या वही हुआ होता है
जिसको होना होता है?
जो हुआ होता है
क्या वही होने को था?
असमंजस, कशमकश, उँहापोह
में भला क्या ही होता है।
कई सयाने इसीलिए कह गए
जो होता है, अच्छा ही होता है।
नहीं तो विचार विमर्श में ही बीत जाए जिंदगी
और कुछ नहीं होता।
पर, कुछ कैसे नहीं होता
कुछ तो होता, जब भी होता,  जो भी होता।


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