डर समय का नहीं होता, तो
मुड़ जाता,
और चल पड़ता उस पगडंडी पर
जो लुप्त थी,
न जाने कितने रहस्य खुलते?
पर जिज्ञासा को रोक कर,
चल पड़ा मैं वही पुरानी राह।
आज फिर वही पगडंडी है सामने,
अब डर नहीं, कौतुहल है,
असमंजस भी
और एक विचित्र एहसास ।
समय को खोने का नहीं,
पर यह कि
कहीं वही बीता समय फिर मिल गया तो ?
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