आज अचानक मुझे सूझा
मैं कवि बन जाऊं
कुछ पंक्तियां कह लूंगा
कुछ बातें सुना दूंगा
भाषा का भले ही सही ज्ञान न हो
और ना ही व्याकरण में निपुणता
शब्दकोश भी बस सिर्फ चंद पन्नों का
बस लेकर सहारा लय का
मैंने भी कविता सुना दी
अपने अमूल्य ज्ञान का
पिटारा खोल डाला
ऐसा कुछ नया नहीं था
जो कभी न कहा हो
भय बस एक बात का था
सुनने वाला अगर कोई
मेरे इस ढोंग पर
रोशनी जो डाल देता
पर किसी ने ऐसा कुछ नहीं किया
और कविता का ढोंग बना रहा
सुनने वाले तो अब कविता सराह भी रहे थे
आखिरकार, आगे चलकर वे भी
कुछ ऐसा ही ढोंग जो रचने वाले थे
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